एक दिन और कट गया । सांझ का चूल्हा फूकती गरम हवा जेठ के महीने का पल पल आभास दिला रही थी । दिन अभी ठीक से ढला नहीं था और महुआ फरफराती हुई खले में मुसल से धान कूटने बैठ गयी। न जाने कितनी ज़िम्मेदारियों का बोझ था उसके कंधे । दिन में ढूंढी लकड़ी के सेठों से पूरे परिवार के लिए शाम का खाना बनाना, गैया माता के लिए खली की तैयारी और दूध दुहना, बूढ़े हो चले ससुर के लिए हुक्का बनाना और यही सब काम करते हुए बीच बीच में साँस की तीखी कमेंट्री को कानो कान निकालते रहना । वाकई गज़ब का झुझारूपन था महुआ में जो सुबह से शाम, दिन महीने, साल पे साल बीतने पर भी बिलकुल तठस्थ था उन चीटों की तरह जो हर साल जेठ जाते जाते पंखों पे ताप भर चल देते थे अनंत की तलाश में ।
'अम्मा आज रात मीठी सोठ की चटनी बनाना,' अपने लट्टू से खेलते हुए बिन्नू बोला । बुखार का ताप जेठ के महीने में बिन्नू को पिछले कई दिनों से पकडे बैठा था । आज उसके मन की ये चटपटी चाह बमुश्किल ज़ुबा पे आयी थी । पर मुसल की थाप की धुन में महुआ ने जैसे कुछ सुना ही नही । वो तो बस लगी पड़ी थी अपनी लड़ाई लड़ने । उसके शरीर से बहता पसीना माहोल को और गरम कर रहा था । बिन्नू को लग गया था की अम्मा ने उसकी बात सुनी नहीं। इस बार वो हाथ में लट्टू घूमते महुआ की साड़ी खींचते बोला 'अम्मा आज रात मीठी सोठ .......' इसके बाद के शब्द बिन्नू की ज़बान में जैसे धरे के धरे रह गए क्योकि उसके हाथ से लट्टू छूट कर ओखली में मुसल के नीचे आना, कड़ाक की आवाज़ करते लकड़ी के लट्टू के दो टुकड़े हो जाना और महुआ के हाथों से मुसल उछल जाना, ये तीन चीज़े एकाएक इक्कठा घटित हो गयी थी । बिन्नू ने सकपकाकर सहमे हुए महुआ को देखा । दिन भर की कमर तोड़ मेहनत और और शरीर की थकन महुआ पे पहले से भारी थी । उसका उठा हाथ बिन्नू के कमज़ोर तपते शरीर के बर्दाश्त के बाहर था और महुआ को जब तक उस रूंधी हुई आखों के आँसू दिखते तब तक बहुत देर हो चुकी थी । ये तो समय था । एक बार जो बीत गया सो बीत गया । उस आग उगलते दिन का आखरी प्रहर जाते जाते अपने साथ महुआ के सारे सपने ले उड़ा था ।
Sunday, April 14, 2019
महुआ
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